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यादों का शहर

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यादों के शहर से बस गुज़र ही रहा था , कुछ तेज चलते हुए , कुछ हड़बड़ी मेरे चहरे पर साफ नजर आ रही थी। सामने से आने वाले दोनों लोगों का ध्यान सड़क पर कम और मेरे चहरे पर ज्यादा नज़र आ रहा था और मेरे गुज़र जाने के बाद पलट कर भी देख रहे थे , शायद!। या शायद मेरे डर को जानने की कोशिश में थे।

तेजी से चलते हुए , मेरी नज़र उस याद के पेड़ पर जा पड़ी जहाँ से कुछ सुखी हुई यादें हवा की लहर के साथ मेरे बदन से आ लिपटीं और वही हुआ जिसका मुझे डर था , मैं यादों के शहर से बस चुप-चाप गुज़र जाना चाहता था।

आँख पर बैठी एक छोटी सी शरारती याद ने पलक उठाते हुए पूछा-“पिछली बार चुप-चाप निकल गए थे!!?”। पीछे से कुछ सफेद बालों वाली हाँफती हुई आवाज में-” अरे बेटा सुनो! कैसे हो ? तुम्हारे पिताजी …….। इतने में कढ़ी आवाज में बोलते हुए-“का अम्मा! क्यों परेशान कर रही हो!!?(कुछ सफेद बालों वाली याद को डाँटते हुए) कहाँ!! जल्दी में हो ?

चलो आओ ,थोड़ी देर बैठो , सुस्ता लो , यादों के शहर की कुछ मीठी सी यादों से इस क्रक्स सी जिंदगी को थोड़ा मीठा कर लो”(मुझ से बोले)। अरे नहीं! नहीं! भाई आज थोड़ा जल्दी में हूँ, फिर कभी (कहते हुए मैने अपने कदमों को थोड़ा और तेज चलाना शुरू किआ)। इतने में पीछे से एक मीठी सी आवाज आती है-“विष्णु!!!(कदम ठहर जाते है, ये आवाज कुछ जानी पहचानी सी लग रही थी) कैसे हो? भूल गए ? या कोशिश में हो !?(मेरे दाईं ओर खड़ी ये याद बेहद खूबसूरत थी)परेशान हो? मै परेशान तो नही कर रही(दोनों हाँथ मेरे गालों पर रखते हुए) मेरा हाँथ थाम लो ! चलो मै तुम्हारे साथ यादों के शहर से बाहर निकलने तक तुम्हारे साथ चलती हूँ , पर तुम बस मेरा हाथ मत छोड़ना”(इतना कहते हुए वो मेरे दाएं हाथ की उंगलियों में अपनी उंगलियाँ फसाए साथ चलने लगी)।

“तुम बस कभी हाँथ मत छोड़ना……”(मेरी जिंदगी के आज से पाँच साल पहले का सबसे खुबसूरत हिस्सा) हॉस्टल की छत की शरारतों से लेकर सड़क के किनारे तक की नादानियों में बस यही तो कहा करती थी! मुझे क्या चाहिए? बस दो पल की साँसे, एक तुम्हारी और एक मेरी!!।

(याद ने मेरे हाँथ को थोड़ा और कस के पकड़ा तो कुछ पल और साफ हो गए) बारिश(मेरा पसंदीदा मौसम) होकर रुकी थी , रोड गीला था। पास के रेस्टॉरेंट की रंग-बिरंगी रोशनी और ऊपर से स्ट्रीट लाइट की रोशनी में नादानियाँ करती हुई, मेरे हाँथ को अपने हाँथ में फसाए हुए और कुछ बच्चों जैसी हरकतें करते हुए-“सुनो विशु! मुझे आइस क्रीम खानी है।” “बेबकूफ!! सर्दी हो जाएगी”(मैने डाँटते हुए बोला)। “फिर, गोल गप्पे!!?”(उसने पूछा)। “ठीक है”(मैने हलके से बोला)।

उस रात बहुत सारी बातें हुईं हमारी। इस बात से अंजान कि ये आखिरी ऐसी मुलाकात है, और ऐसी शाम फिर कभी नही होनी।

“अरे!(याद कहती है) देखो हम यादों के शहर से आगे निकल आये और पता भी नही चला, इसके आगे का सफर तुम्हें अकेले ही तय करना है, मुझे देर हो रही है, मुझे अब लौट जाना चाहिए”। इतना कहते हुए वो तो चली गई और मुझे एक मझदार में छोड़ गई, जहाँ शायद!मुझे उसकी सबसे ज्यादा जरुरत थी।

‘इसके आगे का सफर तुम्हें अकेले ही तय करना पड़ेगा , मुझे देर हो रही है , अब लौट जाना चाहिए…..’ शायद! आखिरी शब्द थे , जो उसने मेरे सामने खड़े हो कर कहे थे , कुछ आँखें चुराते हुए। मैं बस देख रहा था उसे जाते हुए अकेले! जहाँ से आज से पहले वो कभी मेरे हाथों से लिपटे बिना गई ही नही। दिल बस एक बार और उसे बेबकूफ बुलाना चाहता था ,उसे रोक लेना चाहता था । पर शायद ! मैं उसके साथ-साथ ये हक भी खो चुका था ।

शर्ट की जेब में एक छोटी सी याद(जो शायद! यादों के शहर से चुपके से आ गई थी) उछल-कूद करने लगी,मैने निकाल कर हथेली पर रखा तो पूछने लगी-” क्या हुआ?, उस रात?”(बहुत ही मासूमियत से पूछ रही रही थी और मैं खुद को रोक नही पाया)।

“कुछ अपना जान कर , कुछ फिक्र करके , बहुत प्यार से सम्भाल के रखा था मैंने , सिर्फ कुछ लोगो से दूर ही तो रहने को कहा था!! Because i cares you a lot बेबकूफ(कहते – कहते रो पड़ा) बस यही चाहते थे न! तुम्हारे आस – पास के लोग , अब तो खुश होंगे??

” तुम्हारी जिंदगी में अब नए लोग है , और

हमने लोगो को निकाल कर नई जिंदगी की शुरुआत की है”।

– विष्णु भारद्वाज।

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